आदिवासी बाहुल्य मरवाही में प्रशासनिक आदेश पर सवाल, पत्रकार से कथित दुर्व्यवहार का आरोप…..
ग्राम रोजगार सहायकों के नवीन प्रभार आदेश की वैधानिकता भी सवालों के घेरे में, CEO विनय कुमार सागर से जवाब मांग रहा मामला

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही :- आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र मरवाही में जनपद पंचायत से जारी ग्राम रोजगार सहायकों के नवीन प्रभार संबंधी आदेश को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। एक ओर 19 अगस्त 2026 को जारी आदेश में पांच ग्राम रोजगार सहायकों के प्रभार में किए गए बदलाव की प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसी आदेश के संबंध में जानकारी और नियमों को लेकर सवाल पूछने वाले पत्रकार मिथलेश आयम ने जनपद पंचायत मरवाही के CEO विनय कुमार सागर पर कथित रूप से दुर्व्यवहार किए जाने का आरोप लगाया है।
पत्रकार का आरोप है कि जब उन्होंने नवीन प्रभार आदेश के आधार, अधिकार और संबंधित नियमों को लेकर सवाल किया, तब उन्हें संतोषजनक जानकारी देने के बजाय कथित तौर पर यह कहा गया— “तेरे को जो छापना है छाप, नौटंकी मत कर।”
हालांकि, उक्त कथन की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और CEO विनय कुमार सागर का विस्तृत पक्ष सामने आना बाकी है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित टिप्पणी वास्तव में की गई थी या नहीं।
19 अगस्त के आदेश ने खड़े किए कई सवाल
विवाद की शुरुआत जनपद पंचायत मरवाही से 19 अगस्त 2026 को जारी ग्राम रोजगार सहायकों के नवीन प्रभार संबंधी आदेश से बताई जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार आदेश के माध्यम से पांच ग्राम रोजगार सहायकों के वर्तमान प्रभार/पदस्थापना में बदलाव किया गया है।
आदेश में प्रशासनिक दृष्टिकोण तथा बीवी-जीरामजी योजना से संबंधित कार्यों के सुचारु संचालन का उल्लेख किया गया है। लेकिन अब मुख्य सवाल यह है कि ग्राम रोजगार सहायकों के प्रभार में इस प्रकार बदलाव करने के लिए जनपद पंचायत CEO के अधिकार और प्रशासनिक शक्तियां क्या हैं?
क्या इसके लिए कोई स्पष्ट शासनादेश, विभागीय निर्देश अथवा सक्षम प्राधिकारी का आदेश मौजूद है? क्या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया? क्या संबंधित कर्मचारियों से जुड़े प्रभार परिवर्तन के लिए किसी उच्च अधिकारी की अनुमति आवश्यक थी? यदि अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह प्राप्त की गई?
यही वे प्रश्न हैं जिनका स्पष्ट जवाब सामने आने के बाद आदेश की प्रक्रिया को लेकर स्थिति काफी हद तक साफ हो सकती है।
पत्रकार ने पूछे नियम, सामने आया कथित विवाद
बताया जा रहा है कि पत्रकार मिथलेश आयम ने इसी आदेश के संबंध में जनपद पंचायत CEO से जानकारी लेने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य कथित तौर पर यह जानना था कि पांच ग्राम रोजगार सहायकों के प्रभार में बदलाव किस नियम और किस प्रशासनिक अधिकार के तहत किया गया।
पत्रकार के अनुसार, सवालों का जवाब देने के दौरान CEO का व्यवहार कथित रूप से विवादित रहा और उन्हें “तेरे को जो छापना है छाप, नौटंकी मत कर” जैसी टिप्पणी सुननी पड़ी।
यदि पत्रकार का आरोप जांच में सही पाया जाता है, तो यह मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश की वैधानिकता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी अधिकारियों और मीडिया के बीच संवाद तथा सार्वजनिक जवाबदेही के प्रश्न से भी जुड़ जाएगा।
क्या प्रशासनिक आदेश पर सवाल पूछना गलत है?
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सरकारी आदेश सार्वजनिक प्रशासन का हिस्सा होते हैं और उनसे संबंधित नियम, अधिकार तथा प्रक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यदि कोई पत्रकार किसी आदेश की वैधानिकता, अधिकार क्षेत्र या प्रक्रिया के संबंध में सवाल करता है, तो आदर्श रूप से संबंधित अधिकारी द्वारा नियम, शासनादेश अथवा दस्तावेज के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
ऐसे में अब चर्चा इस बात की भी है कि यदि नवीन प्रभार आदेश पूरी तरह नियमों के अनुरूप है, तो उसके पीछे लागू नियम और सक्षम प्राधिकारी की शक्तियों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने में क्या आपत्ति है?
वहीं दूसरी ओर, यदि आदेश किसी विशेष प्रशासनिक परिस्थिति के आधार पर जारी किया गया है, तो उस परिस्थिति और आदेश के कानूनी आधार को भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
आदिवासी क्षेत्र में आदिवासी पत्रकार से कथित व्यवहार ने बढ़ाई गंभीरता
मरवाही क्षेत्र आदिवासी आबादी की महत्वपूर्ण उपस्थिति वाला इलाका है। इसी क्षेत्र में कार्यरत पत्रकार मिथलेश आयम द्वारा स्वयं को आदिवासी समुदाय से संबंधित बताया गया है। ऐसे में उनके द्वारा लगाए गए कथित दुर्व्यवहार के आरोप ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
हालांकि केवल किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान के आधार पर आरोप को सही या गलत नहीं माना जा सकता। इसकी वास्तविकता का निर्धारण तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही होना चाहिए।
फिर भी सवाल यह जरूर है कि क्या किसी पत्रकार द्वारा प्रशासनिक आदेश पर सवाल पूछे जाने पर अधिकारी और पत्रकार के बीच संवाद गरिमापूर्ण तरीके से हुआ था? यदि नहीं, तो इसकी जांच कौन करेगा?
पांच रोजगार सहायकों के प्रभार परिवर्तन की प्रक्रिया सार्वजनिक हो
मामले में सबसे महत्वपूर्ण मांग अब यही सामने आ रही है कि 19 अगस्त 2026 को जारी आदेश का प्रशासनिक और कानूनी आधार स्पष्ट किया जाए।
प्रशासन यदि निम्न बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करता है तो विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है—
– पांच ग्राम रोजगार सहायकों के प्रभार में बदलाव का आधार क्या था?
– आदेश जारी करने वाले अधिकारी को इसके लिए कौन-सी प्रशासनिक शक्ति प्राप्त है?
– संबंधित शासनादेश अथवा विभागीय निर्देश कौन-सा है?
– क्या किसी उच्च अधिकारी अथवा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली गई?
– क्या प्रभार परिवर्तन से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया?
– क्या सभी संबंधित कर्मचारियों को आदेश की सूचना नियमानुसार दी गई?
– आदेश में प्रशासनिक दृष्टिकोण का आधार क्या था?
– बीवी-जीरामजी योजना के कार्यों के सुचारु संचालन के लिए प्रभार परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
– क्या इस संबंध में कोई प्रस्ताव, नोटशीट या अनुमोदन उपलब्ध है?
इन दस्तावेजों के सामने आने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि आदेश नियमों के अनुरूप जारी किया गया था या उसमें किसी स्तर पर प्रक्रिया संबंधी प्रश्न मौजूद हैं।
पत्रकार के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच
दूसरी ओर पत्रकार मिथलेश आयम द्वारा लगाए गए कथित दुर्व्यवहार के आरोपों को भी केवल आरोप मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि पत्रकार के पास बातचीत से संबंधित कोई रिकॉर्डिंग, वीडियो, प्रत्यक्षदर्शी या अन्य प्रमाण उपलब्ध है, तो उसकी निष्पक्ष जांच की जा सकती है।
इसी तरह CEO विनय कुमार सागर का पक्ष भी सामने आना जरूरी है। यदि उनके अनुसार पत्रकार द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं, तो उनका स्पष्टीकरण भी सार्वजनिक चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
किसी भी एक पक्ष के बयान के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय दोनों पक्षों के कथनों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच ही इस विवाद को सही दिशा दे सकती है।
जिला प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती
पूरे घटनाक्रम ने जिला प्रशासन के सामने दो अलग लेकिन आपस में जुड़े प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
पहला प्रश्न ग्राम रोजगार सहायकों के नवीन प्रभार आदेश की वैधानिकता, अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया से संबंधित है।
दूसरा प्रश्न पत्रकार मिथलेश आयम द्वारा लगाए गए कथित दुर्व्यवहार के आरोपों से संबंधित है।
दोनों मामलों में पारदर्शिता से जांच होने पर ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
यदि आदेश नियमसम्मत है, तो संबंधित शासनादेश और अधिकार का स्पष्ट उल्लेख विवाद को समाप्त करने में मदद करेगा। वहीं यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया संबंधी कमी सामने आती है, तो प्रशासनिक स्तर पर उचित कार्रवाई की आवश्यकता होगी।
इसी तरह यदि पत्रकार द्वारा लगाए गए कथित दुर्व्यवहार के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो प्रशासन को इस पर भी नियमानुसार संज्ञान लेना होगा। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो वह स्थिति भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।
अब निगाहें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर
मरवाही में उठे इस विवाद ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस तेज कर दी है। सवाल केवल पांच ग्राम रोजगार सहायकों के प्रभार परिवर्तन तक सीमित नहीं रह गया है। अब सवाल यह भी है कि सरकारी आदेशों को लेकर सवाल पूछने वाले पत्रकारों के साथ प्रशासनिक अधिकारियों का व्यवहार किस प्रकार का होना चाहिए।
फिलहाल पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष के बाद ही निकाला जा सकता है।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन 19 अगस्त 2026 के नवीन प्रभार आदेश का नियमगत आधार सार्वजनिक करता है या नहीं, और पत्रकार मिथलेश आयम द्वारा लगाए गए कथित दुर्व्यवहार के आरोपों पर कोई निष्पक्ष जांच कराई जाती है या नहीं।
इन दोनों मुद्दों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि विवाद की वास्तविक वजह प्रशासनिक प्रक्रिया में है, आदेश की व्याख्या में है या फिर दोनों पक्षों के बीच हुए कथित संवाद को लेकर है।




